11 वर्षीय बालक ने रखे रमज़ान माह के पुरे रोज़े, धार्मिक आस्था और अनुशासन की मिसाल

अब्दुल कदीर बक्श ( हिंगणघाट )
हिंगणघाट - रमज़ान इस्लाम धर्म में संयम, इबादत और आत्मसंयम का पवित्र महीना माना जाता है। रोज़ा केवल भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं, बल्कि आत्मिक और मानसिक शुद्धिकरण का एक जरिया भी है। इस क्रम में जब कोई बच्चा छोटी उम्र में ही इस परंपरा को पूरी निष्ठा से निभाता है, तो यह न केवल उसके परिवार बल्कि पूरे समाज के लिए गर्व की बात होती है।
ऐसी ही एक प्रेरणादायक मिसाल पेश की है, 11 वर्षीय मोहम्मद फैज़ मोहम्मद मक़सूद बावा ने ।
इतनी कम उम्र में पूरे रमज़ान के रोज़े रखना एक साधारण उपलब्धि नहीं है। यह उनके धैर्य, आत्मसंयम और धार्मिक आस्था को दर्शाता है। इस पवित्र कार्य में उनके परिवार ने भी उनका पूरा साथ दिया, जिससे यह और भी प्रेरणादायक बन जाता है।
बच्चे अक्सर अनुशासन को चुनौती मानते हैं, लेकिन जब धार्मिक मूल्यों की शिक्षा सही तरीके से दी जाती है, तो वे इसे अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बना लेते हैं। मोहम्मद फैज़ ने रोज़ों के दौरान संयम और धैर्य बनाए रखा, जो उनके मजबूत इरादों और अल्लाह में गहरी आस्था को दर्शाता है।
उनका यह प्रयास न केवल इस्लामिक परंपराओं का सम्मान है, बल्कि अन्य बच्चों और युवाओं के लिए भी एक प्रेरणा है। यह हमें सिखाता है कि अनुशासन और संकल्प के साथ कोई भी कार्य कठिन नहीं होता।
अल्लाह इस नन्हे रोज़ेदार की इबादत कबूल करे और उसे जीवन में कामयाबी, सेहत और खुशहाली बख्शे। ऐसी प्रेरणादायक कहानियाँ हमें यह एहसास कराती हैं कि आस्था और समर्पण की कोई उम्र नहीं होती